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Abstract

बीसवीं सदी में व्यक्ति हो या समाज, पहचान के संकट से पूरा भारतीय समाज गुजरा। बीसवीं सदी के उत्तर्राद्ध और इक्कीसवी के प्रारम्भ में हिन्दी साहित्य जगत में अनेक विमर्श उभर कर सामने आये, जिनमें प्रमुख थे दलित-विमर्श, आदिवासी विमर्श, स्त्री-विमर्श इत्यादि। इन विमर्शां के अर्न्तगत ‘अस्मिता’ या ‘पहचान’ का सवाल ही सबसे महत्वपूर्ण था। सदियों से उपेक्षित हाशिए का जीवन जी रहे दलितों को और समाज की आदि आबादी की हिस्सेदारी का दावा रखने वाली एवं दोयम दर्जे पर रखी जाने वाली स्त्री के अधिकारों और उनकी दशा को सुधारने के लिए साहित्य में इन विमर्शो ने अपनी महती भूमिका निभाई है। साहित्य के माध्यम से एक नया विमर्श उभरकर सामने आया है वो है थर्ड जेंडर’ विमर्श। आखिर साहित्यिक परिदृश्य में ‘थर्ड जेंडर’ विमर्श की आवश्यकता क्यों पड़ी? सम्भवतः इसी अभाव ने ‘थर्ड जेंडर’ विमर्श को जन्म दिया।

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